chinese army vs indian army. चीन की मीडिया (media) ने बताइए चीन की सेना की सबसे बड़ी कमजोरी!


चीन की मीडिया (media) ने बताइए चीन की सेना की सबसे बड़ी कमजोरी!


चीन की सेना की सबसे बड़ी कमजोरी?? चीन की सरकार ने अपने ही पत्रकार को किया जेल!

चीन के पत्रकार ने जून 2021 में बताया कि चीन की सेना पहाड़ों पर नहीं लड़ सकती। तो चीन की सरकार ने उस पत्रकार को पकड़ कर जेल में डाल दिया। और इस दबाव को कम करने के लिए चीन की सरकार ने भारत के साथ लगने वाले बॉर्डर (सीमा) पर बुलेट ट्रेन का तालमेल
(connectivity) काफी तेज कर दिया है। और वहां चीन ने (S-400) मिसाइलों को तैनात कर दिया है। 
चीन की मीडिया ने कहा है कि चीन की सेना तिब्बत के पठारी भाग में, हिमालय पर्वतों की अधिक ऊंचाई पर नहीं लड़ सकती। और हकीकत भी यही है। क्योंकि चीन ने अपनी सेना को पर्वतों पर पर लड़ने का अभ्यास ही नहीं कराया। इसके विपरीत भारत ने 1970 से ही अपनी सेना को पहाड़ों पर लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार किया है।

    पूरी दुनिया में पर्वतों पर लड़ने में सर्वश्रेष्ठ है भारत के सैनिक।

     भारत के पास पहाड़ पर लड़ने वाले अलग से रेजिमेंट (समूह) है। भारत के सिपाहियों को पर्वतों पर लड़ने की क्षमता देने में भारत की जलवायु का भी कुछ योगदान है क्योंकि उत्तर-पूर्व से जो सैनिक भर्ती होते हैं जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड से जो सैनिक भर्ती होते हैं वह पहाड़ों की लड़ाई में बहुत अच्छे होते हैं। पूरी दुनिया में जब पहाड़ों पर लड़ने वाले सैनिकों का के कौशल का सर्वे ( Survey) किया गया। तो भारत के
    सैनिक पूरी दुनिया में सबसे बेहतरीन पाए गए पहाड़ों पर लड़ने के लिए। भारत के सैनिक पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है।
    यह खबर सुनकर चीन का मानसिक संतुलन हिल गया और उसने अपने पत्रकार को जेल में डाल दिया। चीन की सेना पहाड़ों पर 15 दिन भी नहीं रह पाती है उनको हाइफोक्सिया (hypoxia) होने लगता है, सांस फूलने लगता है जैसे करोना मैं सांस फूलता है उनको अजीब- अजीब बीमारियां होने लगती है। और उनको अपने कैंप में वापस लाना पड़ता है। 

    भारत और चीन के बीच गलवान घाटी तनाव

    आपको याद ही होगा कि जून 2020 में चीन गलवान घाटी में अनधिकृत रूप से प्रवेश कर लिया था। तब भारत और चीन के सिपाहियों में झड़प(मार-पीट) भी हुई थी। परंतु वह पहले से तैयार थे। जब भारत के 18 से 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। कि भारत में भी जवाबी कार्यवाही करते हुए चीन के 40 से 42 सिपाहियो को मौत के घाट उतार दिया था। परंतु चीन तो यह बताया ही नहीं कि उसके कितने कुत्ते मरे थे।
    चीन की सेना का पहाड़ों पर लड़ते हुए सांस फूलने लगता है चीन की सेना को बर्फ में ठंड मार देती है। उनको बार-बार कैंप में वापस भेजना पड़ता है। चीन की सेना सोचती है कि पहाड़ों पर चढ़ेंगे कैसे इस पर तो कुछ दिखाई ही नहीं देता। चीन को पहाड़ों पर लड़ने में परेशानी होती है।

    पहाड़ों पर भारतीय सेना का पराक्रम

    क्योंकि चीन कि भारत के साथ पूरी सीमा पर्वतीय है। इसीलिए भारत को पता था। कि चीन से 1962 में धोखा मिला है। लेकिन तब से ही भारत ने अपने सैनिकों को पहाड़ों पर लड़ने के लिए बेहतरीन ढंग से तैयार किया है।
    भारत में 1999 में कारगिल की लड़ाई पहाड़ों पर जीत लिया। 1984 में शियाचिन युद्ध पहाड़ों पर जीत लिया गया।
    भारत में पर्वतों पर लड़ने वाले सैनिकों के अलग-अलग समूह(रेजीमेंट) बनाए हैं। 

    सबसे बेहतरीन है(para-troops commando) पहाड़ों पर लड़ाई के लिए यह हवाई जहाज से पैराशूट लगाकर पहाड़ों के ऊपर कूद जाते हैं। इस हिसाब से भारतीय सिपाहियों का अभ्यास करवाया जाता है।
    मैदानी लड़ाई के लिए पाकिस्तान के लोग लोन्गैवाला की लड़ाई को कैसे भूल सकते हैं। भारत ने हर परिस्थिति में लड़ने के लिए सैनिकों का अलग-अलग समूह तैयार किए हैं।

    जैसे जंगलों में लड़ने के लिए नागा रेजीमेंट, बाढ़ में लड़ने के लिए बिहार रेजीमेंट, ऐसे अलग-अलग कई सारे रेजिमेंट है सिख रेजीमेंट, कुमाऊं रेजिमेंट, गढ़वाल रेजीमेंट, राजपूताना रेजीमेंट आदि।
    भारत में अलग-अलग सैनिकों के रेजिमेंट बनाए गए हैं। उन सैनिकों को ऐसी जगहों से भर्ती किया जाता है है जहां उनके पास पहले से ही उस माहौल में ढलने की प्राकृतिक क्षमता होती है। जैसे गोरखा लोग या उत्तराखंड के लोगों के पास पहाड़ी माहौल में ढलने की पहले से ही प्रकृति क्षमता होती है 
    तिब्बत के पठारो ओर हिमालयपर्वतो के ऊपर हवाई जहाज भी आसानी से नहीं उड़ पाते हैं। उसका पावर काम नहीं करता, ऑक्सीजन काम नहीं करता। इसीलिए पर्वतों पर थल-सेना का कौशल अच्छा होना चाहिए तभी वह  युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाएगे।

    जिन पर्वतों की ऊंचाई पर चीन की सेना का दम घुटता है। उन्हीं पर्वतों की ऊंचाई पर कुमाऊँ रेजीमेंट की परवरिश करके उन्हें बड़ा किया जाता है। उत्तराखंड वाले लोग तो पहाड़ों की ऊंचाई पर खेलने चले जाते हैं।लेकिन चीन के सिपाहियों का पहाड़ों पर दम घुटता है।

    चीन ने भारत के साथ लगने वाले बॉर्डर पर चलाया बुलेट ट्रेन!

    चीन ने बीजिंग से तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक बेहतरीन ढंग से बुलेट ट्रेन को बिछा दिया है। और वह चाहता है कि भारत के साथ लगने वाली चीन की सीमा के साथ-साथ इसे आगे सिजिआन्ग प्रांत तक ले जाया जाए। चीन के पास काफी पैसा है। तो वह ऐसा कर सकता है। लेकिन इससे भी ज्यादा उसे बुलेट- ट्रेन की जरूरत इसलिए है। क्योंकि उसकी सेना सियाचिन और तिब्बत के पठारी भाग में ज्यादा दिन तक नहीं रह पाती हैं। उन्हें बार-बार वापस लाना पड़ता है तो सिपाहियों को लाने ले जाने के लिए उसने बुलेट-ट्रेन को अपनी पहाड़ी सीमाओं के साथ जोड़ दिया है। 
    परंतु भारत को बुलेट-ट्रेन सीमा के पास बिछाने की कोई खास जरूरत नहीं है। भारतीय सैनिकों को 6 महीने के लिए भी सियाचिन पर छोड़ दिया जाए तो भी वह आराम से बिना किसी परेशानी के रह लेते हैं। परंतु सीमा के साथ सड़क और रेल का आवागमन (connectivity) बहुत तेज गति से होनी चाहिए। क्योंकि वहां भोजन और अन्य सामान बंदूक, गोलियां, बम -बारूद और हथियार युद्ध के समय में बहुत तेजी से पहुंचाना जरूरी होता है। इसलिए सीमा के साथ सड़क और रेल का जुड़ाव अच्छा होना चाहिए।

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