Kisan Andolan?

भारत के किसानों ने किया विद्रोह! कृषि कानून संशोधन 2020 को लेकर किसानों का विद्रोह क्यों? आखिर क्या है उनकी मांग?


तीन नए कृषि कानून2020

2020 में भारत सरकार ने जो अध्यादेश की मंजूरी लाने के लिए संसद में कृषि से संबंधित, तीन संशोधन विधेयक रखे थे  । उसको लेकर कई विपक्षी पार्टीयां तथा हरियाणा और पंजाब के किसान थोड़े नाराज दिखाई देते हैं। उन्होंने इसका विरोध प्रदर्शन भी किया।

परंतु सरकार कहना है कि यह 3 विधेयक पूरी तरह से किसानों के हित में है। (आपको तो पता ही होगा।हमारे हिंदुस्तान में यह तब से चलता आ रहा है जब  से 1947 में देश आजाद हुआ था । कि अगर हम सत्ता में हैं तो कुछ भी करें सही ही होगा । चाहे वो G.S.T हो, नोट बंदी हो, F.D.I हो। अगर हम विपक्ष में हैं तो कुछ भी होगा खराब ही होगा।) यह आपको समझना है कि यह सही है या गलत।

 हर चीज का कुछ अच्छाइयां होती हैं तो कुछ बुराइयां भी होती हैं तो हम समझते हैं कि इस  विधेयक में क्या अच्छाइयां हैं और क्या खराबी है और क्या जोड़कर इसे और अच्छा बनाया जा सकता है।

जून 2020 में सरकार ने अध्यादेश(अध्यादेश  तब लाया जाता है जब बहुत जरूरी होता है और राष्ट्रपति से कहकर कानून बनवा दिया जाता है अध्यादेश की चर्चा संविधान के अनुच्छेद 123 में है) लाकर कृषि कानूनों में संशोधन कर दिया।

2020 में सरकार को कोरोना का बहाना मिल गया। कि न प्रदर्शन होगा ना विरोध होगा।और जब इसे कानून बनाने के लिए संसद में लाया गया तब इस पर विवाद होने लगा।

    बीजेपी(BJP) का कहना है कि कांग्रेस ने किसानों को भड़का दिया।

     ठीक है भाई आपकी भी बात मान लेते है परंतु बीजेपी(BJP) की गठबंधन की सरकार ही है शिरोमणि अकाली दल। और अकाली दल की तो उस समय मंत्री थी हरसिमरन कौर जब सरकार इन कानूनों पर राष्ट्रपति से द्वारा अध्यादेश लगवा रही थी जून 2020 में तो हरसिमरन कौर

    मंत्रिमंडल में थी और जब सरकार विधेयक लेकर आई तो किसानों ने विरोध कर दिया। तब हरसिमरन जी को लगा कि पंजाब के किसान विरोध कर देंगे। हमारी तो सरकार ही गिर जाएगी। क्योंकि पंजाब और हरियाणा में बाकी जगहों से मंडी ज्यादा है। तब इन्होंने कहा कि हम इस विधेयक के विरोध में हैं और मंत्रिमंडल के पद से इस्तीफा दे दिया।(इस्तीफा दे दिया खैर गलत बात है)

    तीनों कृषि संशोधन कानूनों का लिंक नीचे दिया गया है आप वहां से जाकर इसके बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।


    कृषि कानूनों पर किसानों की असहमति

    किसानों का कहना है कि सरकार कांटेक्ट फार्मिंग (contract farming) के जरिए निजी कंपनियों को बढ़ाव दे रही है कि आप आकर बोली लगाइए। ताकि सरकार को MSP ना देना पड़े।

    कृषि कानून संशोधन बिल 2020 को लेकर क्यों कर रहे हैं किसान आंदोलन?

    किसानों का कहना है कि सरकार MSP हटा देगी। जब कि मोदी जी कहते हैं कि MSP नहीं हटेगा।

    निजी कंपनियां भी कांटेक्ट वार्मिंग(contract farming) के तहत बोली लगाएंगी और सरकार भी MSP पर फसल खरीदेगी। MSP का मूल्य निर्धारित करने का काम CACP करती है फिर सरकार उस फसल को MSP पर खरीदती हैं  MSP के नियम पर किसान निश्चिंत (free)है।जबकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (contract farming) में किसान निश्चिंत(free) नहीं है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग(contract farming) में अगर कंपनी ने कहा है कि हम ₹25 में गेहूं खरीदेंगे और  फसल काटने के समय बाहर बाजार में गेहूं का भाव ₹60 हो गया तो किसान उसे बाहर नहीं बेच सकता। जबकी MSP पर ऐसा नहीं है अगर बाहर बाजार में फसल का रेट MSP से ज्यादा है तो आप बाहर बाजार में भी बेच सकते हैं।

    हम किसानों को कहते हैं कि आप भी बहक रहे हैं और मोदी जी को भी कहते हैं कि आप बहुत समझदार हो।

    सरकार की मंशा पर सवाल है सरकार की सोच है कि हम MSP हटाएंगे भी नहीं। और रहेगा भी तो किसी काम का नहीं रहेगा।

    सरकार किसानों से ₹25kg. MSP पर गेहूं खरीदती है। और राशन कार्ड (ration card) पर ₹2kg में बेच देती हैं तो सरकार को घाटा लग रहा था जो सरकारी गोदाम है (FCI godown) पहले यहां पर कालाबाजारी कर देती थी। अब सरकार तो बैठी नहीं रहेगी गोदाम पर। तो सरकार वहां अपने अधिकारियों को बैठा देती थी और किसान जब ₹25kg MSP पर गेहूं बेचने आता है तो गोदाम में बैठे अधिकारी कहते हैं जगह नहीं है, बोरा नहीं है ऐसे-वैसे करके किसान को लौटा देते है। फिर जब किसान बाहर बाजार में ₹12 किलोग्राम पर गेहूं बेचता है तो सरकारी गोदाम वाला अधिकारी उस व्यापारी के पास आता है जिसने किसान से अनाज खरीदा था और कहते हैं कि आप हमको यह गेहूं ₹15 किलोग्राम में बेच दीजिए और फिर वह अधिकारी ₹15 किलोग्राम पर दलाल  से खरीदकर सरकारी गोदाम में भर देता है और सरकारी खाते में लिखवा देता है कि किसान से ₹25 में खरीदा है।अब हर kg पर इस अधिकारी को ₹10 का मुनाफा हुआ ।जबकि किसान भी एक kg पर ₹10 नहीं कमा पाता।

    किसानों की मोदी जी की बात नहीं सुन रहे हैं मोदी जी का कहना है कि कांग्रेस ने जितना अनाज खरीदा था एमएसपी पर उस से 30 गुना ज्यादा बीजेपी ने खरीदा है तो मोदी जी अपना सीना थप-थपा रहे हैं जो कि वास्तविकता है यह हम नहीं कह रहे हैं यह सरकारी आंकड़ा कहता है।


    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2014

    लेकिन मोदी जी की मजबूरी बना कर गए थे प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह। उन्होंने एक चुनावी दांव खेला था। उन्हें लग गया था कि 2014 का चुनाव हम नहीं जीतेगे। तो उन्होंने संसद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून(national food security act) 2013 पास करवा दिया। उन्होंने कहा कि अब हर राशन BPLकार्ड ₹2kg पर गेहूं और ₹3 kg  चावल मिलेगा। और 2013 में मनमोहन सिंह कानून बना कर चले गए। अब संसद से पारित हुआ कोई भी कानून हो वह सरकार को मानना पड़ेगा।और सरकार के पास भी भंडारण करने की क्षमता नहीं है आज के समय में आधुनिक भंडारण आ गए हैं और सरकार अभी भी टीन की छत वाले भंडारण का प्रयोग करती है ।

    भारत की आजादी से लेकर आज तक कोई भी सरकार किसानों को ना देखी है और ना देखना चाहती है क्योंकि जब देश आजाद हुआ था तब से लेकर आज तक किसानों की आय 21 गुना बढी है मतलब जो किसान 1947 में एक रुपए कमाता था वह आज ₹21 कमा रहा है तो वहीं बाकी सरकारी अधिकारियों की बात करें तो उनकी आए आजादी से अब तक 180 गुना बढ़ गई है और सरकारी अध्यापकों का वेतन तो 200 गुना बढ़ गई है आपके मन में कभी कभी यह विचार आता होगा कि किसान खुदकुशी, आत्महत्या क्यों करता है जितने सरकारी अध्यापक हैं उनका वेतन काट-पीट कर 21 गुना पर लाइए और जितने सरकारी कर्मचारी हैं उनका वेतन भी 21 गुना पर लाइए तो सरकारी अध्यापक का वेतन ₹9000 होगा फिर हर स्कूल कॉलेज में बच्चे अपनी कक्षा का दरवाजा खोलेंगे तो एक अध्यापक फांसी पर लटका रहेगा।


    किसानों के लिएMRP कर्मों नहीं

    अगर सच में सरकार को किसानों की चिंता होती तो वह MSP को वैसे ही बनाती जैसे MRP है।

    उद्योगों में बने किसी भी वस्तु पर अंतिम मूल्य लिखा होता है जिसे MRP(maximum retail price) कहते हैं जैसे किसी चीज का MRP ₹10 है तो कोई भी व्यापारी उसे ₹10 से अधिक में नहीं बेच सकता। अगर वह ऐसा करता है तो अगले दिन जेल में होग।

     सरकार किसानों के लिए एक MRP(minimum retailp rice) क्यों नहीं लाती है कि कोई भी व्यापारी या कोई भी  इंसान किसान से उसका आलू ₹20 से काम में नहीं खरीद सकता। अगर वह खरीदा है तो अगले दिन जेल में होगा। सरकार MSP को खत्म नहीं करेगी। परंतु MSP रेट निर्धारित कर दिया तो खरीद ही लेगी। किसान सरकारी गोदाम(FCI godonw) में जाएगा तो उसको लौटा दिया जाएगा। मतलब MSP उतना ही रहेगा। लेकिन आपको MSP पर खरीदा नहीं जाएगा। और अगर आप इसके लिए मोदी जी को जिम्मेदार मानते हैं। तो आप यह बता दीजिए कि यह किसके समय पर अच्छा था 

    नेहरू से लेकर आज तक किसी ने किसानों के बारे में नहीं सोचा 2020 कोरोना काल लॉकडाउन में मक्का ₹6 किलो बिका हैं हरियाणा में। जबकि उसका MSP रेट ₹18.50 पैसे था। तब सरकार कहां मर गई थी। हमने तो सुना है कि वहां पर सांसद लोग ट्रैक्टर से विधानसभा जाते हैं अच्छी बात है भाई ।

    1995 में भी मक्का ₹6 किलो था। यानी किसान को 1995  में जो फसल का रेट था आज भी वही दे दो। अब समाधि 95 का रेट भी थमा दो ₹6। राष्ट्रपति का जो वेतन 1995 में था वही दे देते हैं ₹60000.आज ₹500000 ले रहे हैं कोरोना काल में हमारे देश की GDP को बचाया किसानों ने पूरे 3% का योगदान दिया। वरना हमारे देश की GDP उस समय -200 चली गई रहती है लेकिन खिलवाड़ किया जा रहा है उनके साथ केंद्र सरकार तो अच्छा ध्यान नहीं देती। पर राज्य सरकार भी किसानों के लिए MSP स्थाई नहीं कर सकती है । आशा करते हैं कि आपको यह विधेयक समझ में आ गया होगा।

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